सूरदास जयंती विशेष: जानिए सूरदास जी के जीवन के बारे में

सूरदास जयंती पर विशेष,, कृष्ण भक्त सूरदास का जन्म वैसाख मास की शुक्ल पक्ष पंचमी को सन् 1478 ई में हुआ था, इस बार यह तिथि 16 म ई को पड रही है, भगवान श्री कृष्ण के उपासक और ब्रजभाषा के महत्वपूर्ण कवि महात्मा सूरदास का जन्म रुनकता नामक स्थान पर हुआ था, इनके जन्म सन् अभी स्पष्ट नहीं है, क्योंकि 1478—1479 के बीच भ्रम की स्थिति है, हिन्दू पंचाग के अनुसार सूरदास जयंती वैसाख शुक्ल पक्ष पंचमी को मनाई जाती है,

सूरदास जी ने महिमा मण्डित कार्य और उत्कृष्ट साहित्य कौशल के लिए मान्यता प्राप्त की, उनके गीतों और कविताओं ने पूरे देश में बहुत प्रसंसा और स्वीकृति प्राप्त की सूरदास भगवान कृष्ण के सबसे महान अनुयायियों में एक थे देवता और जीवन के विभिन्न चरणों के लिए लेखन और गायन के लिए पूरी तरह समर्पित और इच्छुक थे, सूरदास का जन्म पंडित राम दास सारस्वत के यहाँ आगरा में रूनकता नामक स्थान में ब्राह्मण परिवार में हुआ था, और कुछ लोगों का दावा है कि इनका जन्म हरियाणा के सीही गाँव में हुआ था

जन्म के बाद से अंधे होने के कारण सूरदास अपने परिवार के सदस्यों द्वारा उपेक्षित था, इस तरह की लापरवाही के कारण इनहोंने अपना घर छोड़ दिया था, और यमुना नदी के किनारे रहने लगे, बचपन से ही सूरदास भगवान श्री कृष्ण के बड़े भक्त थे, एक बार सूरदास श्री वल्लभाचार्य से मिले और फिर जल्द ही उनके शिष्य बन गये, बल्लभाचार्य ने सूरदास को भगवान श्री कृष्ण के जीवन उनके जन्म उनके बचपन राधा कृष्ण के बारे में पूरी जानकारी दी, सूरदास ने उस ज्ञान को मधुर कविताओं में भजन में भक्ति गीतों में बदल दिया, सूरदास के सबसे मान्यता प्राप्त और अनुभव जन्य कार्य को सूरसागर नाम से जाना जाता है

शाब्दिक अर्थ में इसका अर्थ है धुनों का महासागर, सूरदास जयंती मुख्य रूप से देश के उत्तरी क्षेत्रों में मनाई जाती है, भक्त भगवान श्री कृष्ण की पूजा और प्रार्थना करते हैं, और साथ ही साथ देवता के सम्मान में व्रत रखते हैं, अनेक संगीत समुदाय विभिन्न कार्यक्रम और कविताओं का आयोजन किया जाता है, माना जाता है कि सूरदास को एक बार भगवान श्री कृष्ण के दर्शन प्राप्त हुये थे, सूरदास बचपन से ही साधु प्रवृत्ति के थे, उनहे गाने की कला वरदान स्वरूप मिली थी, जल्दही ए बहुत प्रसिद्ध भी हो गये थे, कुछ दिनों बाद वह आगरा के पास गौ घाट पर रहने लगे यहाँ से जल्द ही स्वामी के रूप में प्रसिद्ध हो गये, उनकी कृष्ण भक्ति के बारे में अनेक कथायें प्रचलित हैं, सूरदास कृष्ण भक्ति में इतना डूब गए कि वो एक कुऐं में जा गिरे, इसके बाद श्री कृष्ण ने ख़ुद इनकी जिंदगी बचाई, आंखों की रोशनी वापस कर दी

जब कृष्ण भगवान ने उनकी भक्ति से प्रसंन्न होकर वरदान स्वरूप कुछ मागने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि आप मुझे फिर से अंधा कर दै, क्योंकि मैं कृष्ण के अलावा किसी को देखना नहीं चाहता हूं, महाकवि सूरदास के भक्ति मय गीत हर किसी को मोहित करते हैं, अकबर के नवरत्नों में से एक संगीत कार तानसेन ने सम्राट अकबर और महाकवि सूरदास की मथुरा में मुलाकात भी करवाईं थी,,, जसोदा हरि पालनै झुलावै , हलरावै ठुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै, मेरे लाल को आउ निंदरिया काहे न आनि सुवावै, तू काहे नही वेगहि आवै तो को कान्हा बुलावे, अर्थात- सूरदास जी कह रहे है भगवान श्री कृष्ण की माँ उनहे पालने में झुला रही है, माँ यशोदा पालने को हिलाती है,

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फिर अपने लाल को प्रेमभाव से देखती है, बीच में नन्हे कृष्ण का माथा चूम के उसे सुलाने के लिए लोरी भी गा रही है, गीत के शब्दों में नींद से कह रहीं हैं, तू जल्दी क्यों नहीं आ रही है तुझे कान्हा बुला रहाहै, सुत मुख देखे जसोदा फूली, हरषित देखि दूध को दंतिया प्रेम मगन सुधि भूली, बाहिर तैं तब नंद बुलाए देखो धों सुन्दर सुखदायी, तनक तनक सौ दूध दंतुलिया देखो नैन सफल करो आई, अर्थात इस दोहे में संत सूरदास उस घटना का वर्णन कर रहे हैं जब पहली बार माँ यशोदा ने कान्हा जी के छोटे दो दांत देखे यशोदा यह देख फूली नहीं समा रही है इतनी हर्षित हो गयी है कि सुध बुध भी भूल गयीं हैं, खुसी से उनका मन झूम रहा है, बाहर को दौड़ आती है,

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और नन्द बाबा को पुकार कर कह रही है, कि जरा आओ तो और देखो हमारे कान्हा के मुख में पहले दो दांत आयेहै, इसके अलावा अनेक कविताओं भजनों गीतों में सूरदास जी ने भगवान श्री कृष्ण जी के गुण गाये है,,,

पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल

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