श्राद्ध पक्ष विशेष: आओ अपने पितरों का श्रद्धा पूर्वक करें श्राद्ध और तर्पण

आज से हमारे देश में श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) आरंभ हो गए हैं. हिंंदू शास्त्रों के अनुसार 16 दिन तक चलने वाले श्राद्ध की सदियों पुरानी परंपरा रही है कि हम अपने पितरोंं (पूर्वजों) तर्पण करते हुए आराधना करते हैं। श्राद्ध के दिनों में पवित्र मन से अपने पितरों के प्रति श्रद्धा के साथ सूर्य के याद करतेेेे हुए जल विसर्जित किया जाता है.

हिंदू रीति रिवाजों में पितृ पक्ष का बड़ा महत्त्व है. इन दिनों लोग अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध करते हैं. श्राद्ध करने से पितर तृप्त होते हैं और वे हमें आशीर्वाद देते हैं. सनातन धर्म में ही ऐसी सभ्यता रही है कि हम अपने पितरों को देवता के बराबर स्थान देते हैं. पुराणों में बताया है श्राद्ध के दिनों में पितर पृथ्वी पर आते हैं. पितृ पक्ष अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ते हैं. इनकी शुरुआत पूर्णिमा तिथि से होती है और समापन अमावस्या पर होता है. अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक हर साल सितंबर के महीने में पितृ पक्ष की शुरुआत होती है.

आमतौर पर पितृ पक्ष में कुल 16 श्राद्ध होते हैं. इस बार पूर्णिमा श्राद्ध 2 सितंबर को और सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध 17 सितंबर को है. धर्मग्रंथों में कहा गया है कि तीर्थों में जाकर श्राद्ध करने का विशेष महत्व है, लेकिन इस बार कोरोना महामारी के कारण तीर्थ में जाकर श्राद्ध न कर पाएं तो घर पर ही श्राद्ध करें. श्राद्ध में तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन ये तीन चीजें खासतौर से होनी चाहिए।


हिंदू धर्म में श्राद्ध करना बेहद ही महत्वपूर्ण माना जाता है
हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद मृत व्यक्ति का श्राद्ध किया जाना बेहत जरूरी माना जाता है. मान्यता है कि यदि श्राद्ध न किया जाए तो मरने वाले व्यक्ति की आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है. पितृ पक्ष के दौरान पितरों का श्राद्ध करने से वो प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी आत्मा को शांति मिलती है. कहा जाता है पितृ पक्ष में यमराज पितरो को अपने परिजनों से मिलने के लिए मुक्त कर देते हैं. इस दौरान अगर पितरों का श्राद्ध न किया जाए तो उनकी आत्मा दुखी व नाराज हो जाती है. अथर्ववेद में कहा गया है कि जब सूर्य कन्या राशि में रहता है, तब पितरों को तृप्त करने वाली चीजें देने से स्वर्ग मिलता है.

इसके साथ ही याज्ञवल्क्य स्मृति और यम स्मृति में भी बताया गया है कि इन 16 दिनों में पितरों के लिए विशेष पूजा और दान करना चाहिए। इनके अलावा पुराणों की बात करें तो ब्रह्म, विष्णु, नारद, स्कंद और भविष्य पुराण में बताया गया है कि श्राद्धपक्ष के दौरान पितरों की पूजा कैसे की जाए.

ग्रंथों में कहा गया है कि पितृपक्ष शुरू होते ही पितृ मृत्युलोक में अपने वंशजों को देखने के लिए आते हैं और तर्पण ग्रहण करके लौट जाते हैं। इसलिए, इन दिनों में पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और अन्य तरह के दान किए जाते हैं।


दिवंगत पूर्वजों की आत्मशांति के लिए किया जाता है श्राद्ध
पितृ पक्ष के दौरान दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध किया जाता है. माना जाता है कि यदि पितर नाराज हो जाएं तो व्यक्ति का जीवन भी परेशानियों और तरह-तरह की समस्याओं में पड़ जाता है और खुशहाल जीवन खत्म हो जाता है. साथ ही घर में भी अशांति फैलती है और व्यापार और गृहस्थी में भी हानि होती है. ऐसे में पितरों को तृप्त करना और उनकी आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में श्राद्ध करना आवश्यक है. श्राद्ध के जरिए पितरों की तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है और पिंड दान और तर्पण कर उनकी आत्मा की शांति की कामना की जाती है.

इस बार श्राद्ध पक्ष इस प्रकार है. पूर्णिमा का श्राद्ध, 2 सितंबर- प्रतिपदा का श्राद्ध, 3 सितंबर- द्वितीया का श्राद्ध, 5 सितंबर- तृतीया का श्राद्ध, 6 सितंबर- चतुर्थी का श्राद्ध, 7 सितंबर- पंचमी का श्राद्ध, 8 सितंबर- षष्ठी का श्राद्ध, 9 सितंबर- सप्तमी का श्राद्ध, 10 सितंबर- अष्टमी का श्राद्ध, 11सितंबर- नवमी का श्राद्ध, 12 सितंबर- दशमी का श्राद्ध, 13 सितंबर- एकादशी का श्राद्ध, 14 सितंबर- द्वादशी का श्राद्ध, 15 सितंबर- त्रयोदशी का श्राद्ध, 16 सितंबर- चतुर्दशी का श्राद्ध, 17 सितंबर- अमावस का श्राद्ध के साथ समापन हो जाता है.

शंभू नाथ गौतम, वरिष्ठ पत्रकार

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