उत्तराखंड: आसान नहीं है पहाड़ की सियासत में ‘आप’ का चढ़ना

पिथौरागढ़|आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने उत्तराखंड के आगामी विधानसभा चुनावों में उतरने का ऐलान कर दिया है. केजरीवाल साफ़ कर चुके हैं कि सभी 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे जाएंगे. भारी बहुमत के साथ दिल्ली में आम आदमी पार्टी दूसरी बार सिर्फ़ अपने बलबूते सत्ता पर काबिज है लेकिन सच्चाई यह भी है कि दिल्ली से बाहर ‘आप’ को पांव जमाने में खासी दिक्कत हो रही है. उत्तराखंड में जहां बीजेपी और कांग्रेस बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं तीसरी शक्ति की संभावना फ़िलहाल तो नहीं दिख रही है.

2017 में आम आदमी पार्टी ने 29 उम्मीदवारों को गुजरात के चुनावी मैदान में उतारा था लेकिन सभी की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी. हालत यह थी कि ‘आप’ से ज्यादा वोट नोटा को मिले थे. आप को गुजरात में 29 सीटों पर कुल 27000 वोट मिले थे जबकि नोटा को 75880 वोट पड़े. छोटा प्रदेश होने के नाते आप नेताओं को भरोसा था कि गोवा में उन्हें कुछ कामयाबी हासिल होगी लेकिन वहां भी 2017 के विधानसभा चुनावों में उसे निराशा ही हाथ लगी. आप को 6.4 फ़ीसदी वोट के साथ कुल 42 हजार लोगों ने वोट दिया.

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यह बात अलग है कि इसी साल पंजाब में हुए चुनावों में उसने बेहतर प्रदर्शन किया. पंजाब में आप को 23.7 फ़ीसदी वोट मिले और 20 सीटों पर जीत भी मिली लेकिन आम आदमी पार्टी की इस जीत के पीछे कई राजनीतिक कारण थे. 2017 के चुनावों में भाजपा-अकाली गठबंधन की सरकार खासी अलोकप्रिय हो चुकी थी जबकि कांग्रेस को भी लोग बहुत ज्यादा पसंद नहीं कर रहे थे. ऐसे में आप का प्रदर्शन कुछ बेहतर रहा.

2018 में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी आम आदमी पार्टी ने चुनावी ताल ठोकी. छत्तीसगढ़ की 85 सीटों में पार्टी ने उम्मीदवार उतारे लेकिन कोई भी सीट जीतने में उसे सफलता नहीं मिली. वोट प्रतिशत की बात करें तो मात्र 0.9 फ़ीसदी लोगों ने आप को पसंद किया जबकि राजस्थान की 142 सीटों पर चुनाव में उतरी आप को सिर्फ़ 0.7 फ़ीसदी वोट मिले. कुछ ऐसा ही हाल मध्यप्रदेश में भी हुआ. यहां आप के 208 उम्मीदवार 0.4 फ़ीसदी ही वोट जुटा पाए.

आम आदमी पार्टी को सबसे करारा झटका बीते साल हरियाणा में हुए विधानसभा चुनावों में लगा. केजरीवाल के होम स्टेट में पार्टी ने 46 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और सभी की ज़मानत ज़ब्त हो गई. यहां पार्टी को सिर्फ़ 0.45 फ़ीसदी वोट मिले. इस लिहाज से देखें तो दिल्ली से बाहर पांव फैलाने की कोशिशें अब तक आम आदमी पार्टी की क़ामयाब नहीं रही है.

दिल्ली में सीनियर जर्नलिस्ट पूनम पांडे ने आप को लंबे समय तक कवर किया है. उनका मानना है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के पास केजरीवाल का चेहरा है. यही नहीं केजरीवाल सियासत में आने से पहले भी लंबे समय तक दिल्ली में सोशल एक्टिविस्ट के बतौर सक्रिय रहे थे उनके पास एक टीम थी. इसी टीम के साथ केजरीवाल 2012 में अन्ना हजारे के साथ आंदोलन में उतरे.

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दिल्ली चुनाव में उतरने से पहले केजरीवाल टीम ने बिजली-पानी जैसे मुद्दों पर लड़ाई भी लड़ी थी. इसी कारण केजरीवाल को चुनाव में लोगों का अच्छा समर्थन मिला. साथ ही पूनम का मानना है कि दिल्ली से बाहर आम आदमी पार्टी चुनावों में तो जरूर उतर रही है लेकिन दिल्ली जैसा ज़मीनी संघर्ष कहीं दिखाई नहीं देता.

उत्तराखंड में तो आप को और भी ज़्यादा चुनौती का सामना करना पड़ेगा. 13 जिलों वाले उत्तराखंड में 10 ज़िले पूरी तरह पहाड़ी हैं. पहाड़ की विधानसभाओं तक पहुंच पाना भी आसान नहीं है. सोशल मीडिया के ज़रिये भी पहाड़ों तक अपनी बात पहुंचा पाना आसान नहीं है. अधिकांश पहाड़ी इलाके आज भी इंटरनेट से कोसों दूर हैं. पहाड़ों में सियासत का सफर ज़मीनी कार्यकर्ता के सहारे ही पार किया जा सकता है.

राजनीतिक मामलों के जानकार डीएस पांगती का कहना है कि उत्तराखंड की राजनीति बीजेपी-कांग्रेस के इर्द-गिर्द ही रही है. 1992 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बाद क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल को कुछ समर्थन ज़रूर मिला था. लेकिन फिर मतदाताओं का रुझान बीजेपी और कांग्रेस की ओर सिमट गया.

पांगती यह तो मानते हैं कि बीजेपी-कांग्रेस से राज्य का एक तबका खासा नाराज है और ह तीसरे विकल्प को तलाश भी रहा है लेकिन आम आदमी पार्टी ने तीसरा विकल्प बनने के लिए कोई ज़मीनी संघर्ष नही किया है. सिर्फ़ उम्मीदवार उतारने से लोग वोट देंगे इसमें संदेह हैं.

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साभार-न्यूज़ 18

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